
भिवानी: इतिहास गवाह है कि कुछ व्यक्तित्व सिर्फ अपना जीवन नहीं जीते, बल्कि समाज और देश के लिए एक मिसाल बन जाते हैं। सेठ शिरोमणी चौधरी छाजूराम लांबा ऐसी ही महान विभूति थे, जिन्हें जयंती पर भिवानी सहित पूरे हरियाणा में स्मरण किया गया। 28 नवंबर 1861 को अलखपुरा (भिवानी) में जन्मे सेठ छाजूराम ने कठिन परिस्थितियों से आगे बढ़कर न सिर्फ व्यापार में अपना नाम बनाया, बल्कि मानवीय मूल्यों, परोपकार और राष्ट्रसेवा की ऐसी मिसाल कायम की, जिसे आज भी लोग श्रद्धा के साथ याद करते हैं।Haryana News
साधारण किसान परिवार से निकलकर 1883 में रोजगार की तलाश में कलकत्ता पहुंचे छाजूराम कुछ वर्षों में ही मेहनत और लगन के बल पर जूट उद्योग के सबसे बड़े व्यापारियों में गिने जाने लगे। उनकी व्यावसायिक सफलता इतनी व्यापक थी कि उन्हें “जूट किंग” के नाम से जाना जाने लगा। परंतु उनकी असली पहचान उनकी विशाल मानवता और अभूतपूर्व दानवीरता बनी। वे रहबरे-आज़म चौधरी छोटूराम के धर्मपिता भी थे और उनकी उच्च शिक्षा से लेकर रोहतक में नीली कोठी के निर्माण तक कई अहम योगदान उन्होंने ही दिए। यह माना जाता है कि यदि सेठ छाजूराम का समर्थन न मिलता, तो चौधरी छोटूराम जैसा किसान नेता देश को नहीं मिल पाता।Haryana News
सेठ छाजूराम ने शिक्षा, समाज सेवा और राष्ट्र निर्माण के लिए जिस स्तर पर दान दिया, वह अपने आप में अनूठा उदाहरण है। कलकत्ता के शांतिनिकेतन, लाहौर के डीएवी कॉलेज, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, गुरूकुल कांगड़ी, हिसार–रोहतक की जाट संस्थाएं, हिसार का जाट कॉलेज और कई ग्रामीण विद्यालय—ऐसा कोई क्षेत्र नहीं था जहां उनका योगदान न पहुंचे। उन्होंने गरीब और होनहार बच्चों के लिए विशेष छात्रवृत्ति योजनाएं शुरू कीं और सैकड़ों विद्यार्थियों की शिक्षा का पूरा खर्च स्वयं वहन किया।
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आजादी की लड़ाई में भी उनका समर्थन खुलकर सामने आया। महात्मा गांधी, पंडित मोतीलाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस, सरदार पटेल सहित कई शीर्ष नेताओं को उन्होंने मुक्तहस्त दान दिया। नेताजी सुभाष चंद्र बोस को विदेश यात्रा और आजादी के संघर्ष के लिए उन्होंने 5000 रुपये की राशि दी थी, जबकि लालालाजपत राय को 200 रुपये की जगह 2000 रुपये भेजकर उस दौर में उनकी आर्थिक मदद की मिसाल कायम की।
देशभक्ति के मामले में उनका साहस भी कम नहीं था। भगतसिंह द्वारा सांडर्स की हत्या के बाद जब पुलिस पूरे पंजाब में छापेमारी कर रही थी, तब सेठ छाजूराम ने भगतसिंह, दुर्गा भाभी और उनके पुत्र को कलकत्ता में अपने घर में लगभग ढाई माह तक सुरक्षित रखा। देश की आजादी के लिए जोखिम उठाने की ऐसी हिम्मत केवल एक सच्चे राष्ट्रभक्त की ही हो सकती है।Haryana News
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आज उनकी जयंती पर उन्हें केवल जूट किंग के रूप में नहीं, बल्कि शिक्षा, समाजसेवा, राष्ट्रभक्ति और दानशीलता की अनुपम मिसाल के रूप में याद किया जा रहा है। इतिहास की यह उजली विरासत बताती है कि सेठ छाजूराम जैसे महान दानी और कर्मयोगी विरले ही जन्म लेते हैं।
