देश में 22 से अधिक मासूम बच्चों की जान लेने वाला ‘कोल्ड्रिफ कफ सिरप कांड’ अब केवल एक दवा कंपनी की लापरवाही नहीं, बल्कि भारत के स्वास्थ्य तंत्र और दवा नियमन प्रणाली की नाकामी का दर्दनाक उदाहरण बन गया है। जिस दवा फॉर्मूले को जीवन देना था, वही ‘मौत का ज़हर’ बन गया। सवाल यह है कि इतनी बड़ी त्रासदी के बाद भी जिम्मेदारी किसकी तय होगी—निर्माता कंपनी की, नियामक एजेंसियों की या उस सिस्टम की जिसने चेतावनियों के बावजूद आंखें मूंद लीं?
दरअसल, केंद्र सरकार ने 18 दिसंबर 2023 को एक आदेश जारी कर दिया था कि चार साल से छोटे बच्चों को क्लोरफेनिरामाइन मेलिएट (2 mg) और फिनाइलफ्राइन एचसीएल (5 mg) युक्त कफ सिरप नहीं दिया जाएगा, क्योंकि इनसे लाभ कम और नुकसान अधिक होता है। साथ ही आदेश में यह भी अनिवार्य किया गया था कि इस तरह की दवाओं पर स्पष्ट चेतावनी लेबल लगाया जाए। लेकिन इस आदेश का न तो दवा कंपनियों ने पालन किया, न ही राज्य स्वास्थ्य विभागों ने इसकी निगरानी की।
नतीजतन, मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में ‘कोल्ड्रिफ’ सिरप पीने से 16 से अधिक बच्चों की मौत हो गई। जांच में पाया गया कि इस सिरप में प्रतिबंधित फॉर्मूला (पैरासिटामोल + क्लोरफेनिरामाइन + फिनाइलफ्राइन) मौजूद था और बोतल पर किसी तरह की चेतावनी नहीं थी।
जांच रिपोर्ट ने और चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। केंद्र की फाइल संख्या 04-01/2022-डीसी के तहत जिस फॉर्मूले पर प्रतिबंध लगा था, उसी को श्रीसन फार्मास्युटिकल्स ने बिना WHO-GMP (गुणवत्ता प्रमाण पत्र) के तैयार किया। भारत की 5,308 एमएसएमई दवा कंपनियों में से 3,838 ने यह प्रमाण पत्र हासिल किया है, जबकि 1,470 कंपनियां अब तक बिना अनुमति के उत्पादन कर रही हैं। श्रीसन फार्मा भी इन्हीं में से एक थी।
CDSCO की जांच में फैक्ट्री से डीईजी (डाइएथिलीन ग्लाइकॉल) से भरे बिना बिल वाले कंटेनर मिले। यह अत्यंत जहरीला केमिकल है, जिसे सिरप में केवल 0.1% तक मिलाने की अनुमति है, जबकि कंपनी 46-48% तक इसका इस्तेमाल कर रही थी। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि महंगे फिनाइलफ्राइन एचसीएल की लागत बचाने के लिए कंपनी ने यह सस्ता और खतरनाक रसायन मिलाया।
यह घटना गांबिया कफ सिरप कांड के बाद आई चेतावनियों के बावजूद हुई, जब केंद्र ने सभी दवा कंपनियों के लिए WHO-GMP प्रमाणपत्र को अनिवार्य किया था। इसके बावजूद कई कंपनियां अब भी बिना मानक और नियंत्रण के दवाएं बना रही हैं। ऐसे में सवाल यह है कि आखिर इन मौतों की जिम्मेदारी कौन लेगा — लापरवाह कंपनियां, निगरानी में चूक करने वाली एजेंसियां, या वह तंत्र, जो हर त्रासदी के बाद केवल जांच बैठाने तक सीमित रह जाता है?













